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नसीबपुर युद्ध के वीर योद्धाओं की यह है वीर गाथा

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Poonam



नसीबपुर युद्ध के वीर योद्धाओं की यह है वीर गाथा

राव किशन गोपाल , गोपाल देव , राव तुलाराम , अब्दुल समद खान को सलाम

राव कृष्ण गोपाल का  घोड़ा उनके घड़ को लेकर सीधा नांगल पठानी पहुंचा

फतह सिंह उजाला

20 सितंबर 1857 को अंग्रेजों में दिल्ली जीत की खुमारी चढ़ी थी, लेकिन अहीरवाल के योद्धाओं में आजादी की चिंगारी अलग से धधक रही थी।  ऐसे ही योद्धाओं में सबसे महत्वपूर्ण राव किशन गोपाल , गोपाल देव , राव तुलाराम , अब्दुल समद खान जैसे सूर्यवीर और योद्धाओं के नाम शामिल हैं।  जिन्होंने अंग्रेजी सेना के अपनी अंतिम सांस तक लड़ते हुए छक्के छुड़ा दिए।

16 नवंबर 1857, ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं और स्थानीय लोगों की सेनाओं के बीच आखिरी महत्वपूर्ण लड़ाई (उत्तर में) में से एक नारनौल के नजदीक गांव नसीबपुर में लड़ी गई । जोधपुर सेना, झज्जर राज्य, रेवाड़ी और स्थानीय लोगों की सामूहिक सेना के खिलाफ लड़े 1 यूरोपीय बंगाल फूसिलियर, हूरियाना फील्ड फोर्स, गाइड और कैराबिनर्स की एक संयुक्त सेना लड़ी।

16 नवंबर 1857 को अंग्रेजों से युद्ध के दौरान एक अंग्रेजी सैनिक के द्वारा किए गए वार से राव किशन गोपाल का सिर धड़ से अलग हो गया । लेकिन राव कृष्ण गोपाल का वफादार घोड़ा उनके घड़ को लेकर सीधा नांगल पठानी पहुंच गया , इस दौरान रास्ते के गांव कंवाली के पास उनका घड़ घोड़े से गिर गया। घोड़ा नंगल पठानी पहुंच गया , जब लोगों ने उनके घोड़े को लहू से लथपथ देखा तो उन्हें यह भरोसा हो गया कि राव गोपाल वीरगति को प्राप्त हो गए। कंवाली गांव के लोगों ने दाह संस्कार किया और वहां एक समाधि बना दी। जिस की आज भी गांव के लोग पूजा करते हैं और वार्षिक मेला भी लगता है । यह तथ्यात्मक जानकारीएक आरटीआई के जवाब में उपलब्ध करवाई गई । इस जानकारी का लक्ष्य आने वाली पीढ़ी को ऐसे योद्धाओं के बारे में अवगत कराना है, जो केवल किताबों में दबकर रह गये हैं।

सरकारी दस्तावेजों में बताया गया है कि 20 सितंबर को अंग्रेजों ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया था और उस समय के विद्रोहियों की तलाश शुरू कर दी । राव किशन गोपाल मेरठ कोतवाली के कोतवाल थे, ऐसे में उनकी तलाश वहीं से शुरू की गई । नांगल पठानी में किशन गोपाल की जो भी चल अचल संपत्ति थी, उसे अंग्रेजो के द्वारा जप्त कर लिया गया था। इस महान देशभक्त ने अंग्रेजों की गुलामी से देश को आजाद कराने के लिए अपना तन मन धन सब कुछ न्योछावर कर दिया । उनका नाम हरियाणा के इतिहास में हमेशा स्वर्ण अक्षरों में लिखा है और लिखा रहेगा इस महत्वपूर्ण युद्ध और आजादी के संघर्ष में राव तुलाराम के सहयोग को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

राम किशन गोपाल नांगल पठानी के राव जीयाराम के लड़के थे और मेरठ के कोतवाल के पद पर कार्यरत थे।  10 मई 1857 को जब मेरठ छावनी में जनक्रांति हुई तो राव किशन गोपाल ने उसमें बहादुरी के साथ भाग लिया। मेरठ के बाद राम किशन गोपाल अपने गांव नांगल पठानी में लौट आए । उन्होंने रेवाड़ी इलाके में अंग्रेजो के विरुद्ध विद्रोह अथवा युद्ध के लिए लोगों को भी तैयार किया । इतना ही नहीं उनका बड़ा भाई रामलाल भी इस संघर्ष में उनके साथी बने । उस समय अंग्रेजी हुकूमत के सैनिकों के पास आधुनिक तोप और भारी हथियारों के मुकाबले में इन क्रांतिकारियों के पास पारंपरिक और छोटे हथियार थे। जिसके कारण यह अपने मकसद में पूरी तरह से कामयाब नहीं हो सके । यहां हुए भीषण युद्ध में झज्जर की सेनापति के बेटे शहीद हो गए । राव किशन गोपाल और राव रामलाल नांगल पठानी अंग्रेजों से भीषण युद्ध करते हुए शहादत को प्राप्त हुए।

राव गोपाल देव , राव तेज सिंह के दूसरे पुत्र राहुल नाथूराम के घर इनका जन्म हुआ और मात्र 26 वर्ष की युवा अवस्था में अपने पिता के देहावसान के बाद 41 गांव की पैतृक जागीर के स्वामी बने राव तुला राम के साथ राव गोपाल देव के संबंध बेहद  मित्रता पूर्ण रहे । 1857 की क्रांति के आरंभिक दिनों में राव गोपाल देव ने राव तुला राम के नेतृत्व में उनकी सेनाओं का बेहद कुशल और सफल संचालन भी किया ।
16 नवंबर 1857 को नारनौल के युद्ध में राव ने बहुत ही बहादुरी का परिचय दिया । युद्ध की समाप्ति के बाद वह वेष बदलकर बीकानेर की रियासत में चले गए । वहां उदयरामसर नामक गांव में अपने रिश्तेदारों के यहां भूमिगत हो गए। इस दौरान 4 वर्ष तक अंग्रेज तलाशते रहे ,लेकिन कोई भेेद नहीं लग सका। इसी बीच में अंग्रेजी हुकूमत ने राव गोपाल देव के नाम रेवाड़ी के पते पर आत्मसमर्पण के लिए भी संदेश भिजवाए , लेकिन उन्होंने समर्पण नहीं किया । इसके बदले में अंग्रेजी हुकूमत ने गुस्से में आकर राव गोपाल देव की 41 गांव की जागीर तथा अन्य संपत्तियों जप्त कर ली । रेवाड़ी और शाहजहांपुर के परगनों में पूर्ण व्यवस्था तथा शांति सदैव बनी रहे। लेकिन बोहड़ा के परगने में कुछ गड़बड़ी थी , इसका कारण था नवाब फरुखनगर का दखल देना । बादशाह बहादुरशाह ने बोहड़ा राव तुला राम को दे दिया था। नवाब ने अपने चाचा जफरयार खान को एक सेना देकर बोहड़ा पर कब्जा करने के लिए भेजा । 13 अगस्त 1857 को अपने अनुज गोपाल देव को सेना लेकर बोहड़ा पर आक्रमण करने के लिए भेजा । दादरी के नवाब की घुड़सवार फौज भी गोपाल देव की सहायता के लिए आ गई । गोपाल देव ने तुरंत बोहड़ा पर भी कब्जा कर लिया और नवाब के सैनिकों को भी पस्त कर दिया।

मुफ्ती निजामुद्दीन कुतुबपुर रेवाड़ी के रहने वाले थे । 1857 की क्रांति के दौरान राव राजा तुला राम की सेना की पलटन एक के एडज्यूटें थे। अंग्रेजी सेना से लड़ते हुए नसीबपुर नारनौल के युद्ध में 16 नवंबर 1857 को वीरगति को प्राप्त हुए ।

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कंवर मिर खां मौहल्ला 12 हजारी रेवाड़ी के रहने वाले थे । 1857 में राजा तुला राम की सेना की 2 नंबर पलटन में सूबेदार थे । नसीबपुर के युद्ध में 16 नवंबर 1857 को वीरगति को प्राप्त हुए ।

राम रतन उर्फ नत्थू सरावगी में 1857 में राव राजा तुला राम के साथ मिलकर अंग्रेजों का जबरदस्त विरोध किया। वह राजा के प्रशासन में खजांची रहे । 1857 की क्रांति की विफलता के बाद उन्होंने अपना शेष जीवन गुमनामी में बिता दिया ।

नत्थू रामपुरा के रहने वाले नत्थू राम राजा राव तुला राम के सहयोगी थे। 1857 की क्रांति में इन्होंने रामपुरा के किले की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने मजबूत कंधों पर ले ली थी । इसके साथ ही क्रांति में अपना सक्रिय योगदान दिया । इसी दौरान विफलता के चलते अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें फांसी की सजा दे दी ।

हरदेव नई बस्ती के रहने वाले हरदेव ब्राह्मण समुदाय से थे । 1857 में राव तुलाराम के तोप खाने में इन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण और जिम्मेदारी से काम किया । क्रांति की समाप्ति के बाद रेवाड़ी छोड़ कर यह किसी अज्ञात स्थान के लिए रवाना हो गए ।

जोकीराम कुतुबपुर के भार्गव वंश हैं, जोकी राम ने भी राजा तुलाराम के साथ मिलकर 1857 की क्रांति में बेहद ही महत्वपूर्ण योगदान दिया और तमाम योद्धाओं के साथ में अपनी भूमिका को इमानदारी से अदा कर देश की आजादी के लिए काम आये।

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