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पञ्चवटी में लक्ष्मण जी भगवान श्री राम जी से पाँच प्रश्न पूछते हैं

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Poonam

पञ्चवटी में लक्ष्मण जी भगवान श्री राम जी से पाँच प्रश्न पूछते हैं ?????

  • मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा॥
    कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया॥

भावार्थ:-हे देव! मुझे समझाकर वही कहिए, जिससे सब छोड़कर मैं आपकी चरणरज की ही सेवा करूँ। ज्ञान, वैराग्य और माया का वर्णन कीजिए और उस भक्ति को कहिए, जिसके कारण आप दया करते हैं॥

  • ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।
    जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ॥

हे प्रभो! ईश्वर और जीव का भेद भी सब समझाकर कहिए, जिससे आपके चरणों में मेरी प्रीति हो और शोक, मोह तथा भ्रम नष्ट हो जाएँ॥ प्रत्येक जिज्ञासु के ये पांच प्रश्न होते हैं।

१- ज्ञान किसको कहते हैं ?
२- वैराग्य किसको कहते हैं ?
३- माया का स्वरूप बतलाइये ?
४- भक्ति के साधन बताइये कि भक्ति कैसे प्राप्त हो ?
५- जीव और ईश्वर में भेद बतलाइये ?

एक साधक के द्वारा एक सिद्ध को ये पाँच प्रश्न हुए हैं –

भगवान श्री राम लक्ष्मण जी की बात सुनकर कहते हैं –

थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई । सुनहु तात मति मन चित्त लाई ।।

अर्थात् थोड़े में ही सब समझा देता हूँ। यही विविधता है कि थोड़े में ही ज्यादा समझा देता हूँ –

पहले भगवान ने माया वाला सवाल उठाया है क्योंकि पहले माया को जान लेना चाहिए। भगवान कहते हैं कि माया वैसे तो अनिर्वचनीय है लेकिन फिर भी –

मैं अरु मोर तोर तैं माया । जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया ।।

मैं, मेरा और तेरा – यही माया है, केवल छह शब्दों में बता दिया।

मैं अर्थात् जब ” मैं ” आता है तो ” मेरा ” आता है और जहां ” मेरा ” होता है वहां ” तेरा ” भी होता है – तो ये भेद माया के कारण होता है।

जैसे चाचा जी घर में सेब लाये तो अपने बेटे को दो सेब दे दिए और बड़े भाई का बेटा आया तो उसे एक सेब दे दिया। कारण कि ये मेरा बेटा है और वो बड़े भाई का बेटा है। बस मेरा और तेरा – और ज्यादा विस्तार में जाने की आवश्यकता ही नहीं है, यह भेद माया के कारण ही होता है।

उस माया के भी दो भेद बताये हैं – एक विद्या और दूसरी अविद्या
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा ।।
एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें ।।

अविद्या रूपी माया जीव को जन्म-मरण के चक्कर में फंसाती है, भटकता रहता है जीव जन्म अथवा मृत्यु के चक्कर में। और दूसरी विद्या रूपी माया मुक्त करवाती है।

दूसरा प्रश्न – ज्ञान किसको कहते हैं ? हम ज्ञानी किसे कहेंगे ?

जो बहुत प्रकांड पंडित हो, शास्त्रों को जानता हो, बड़ा ही अच्छा प्रवचन कर सकता हो, दृष्टांत के साथ सिद्धांत को समझाये, संस्कृत तथा अन्य बहुत सी भाषाओं का जिसे ज्ञान हो – ज्ञानी !!!!

पंडित और ज्ञानी में अन्तर है, उसे पंडित कह सकते हैं लेकिन ज्ञानी नहीं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने बड़ी अद्भुत व्याख्या की है ज्ञानी की –

ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं । देख ब्रह्म समान सब माहीं ।।

ज्ञान उसको कहते हैं – जहाँ मान न हो अर्थात् जो मान-अपमान के द्वन्द्व से रहित हो और सबमें ही जो ब्रह्म को देखे । ज्ञान के द्वारा तो ईश्वर की सर्वव्यापकता का अनुभव हो जाता है तो सबमें भगवान को देखने लग जाता है।

तीसरा प्रश्न – वैरागी किसको कहेंगे ?

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हमारी परिभाषा यह है कि भगवें कपड़े पहने हो या फिर संसार छोड़ कर भाग गया हो, सिर पर जटायें हो, माथे पर तिलक हो, हाथ में माला लिए हुए हो – वैरागी !!!!

भगवान श्री राम कहते हैं –

कहिअ तात सो परम बिरागी । तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी ।।

परम वैरागी वह है, जिसने सिद्धियों को तृन अर्थात् तिनके के समान तुच्छ समझा। कहने का तात्पर्य है कि जो सिद्धियों के चक्कर में नहीं फंसता और तीनि गुन त्यागी अर्थात् तीन गुण प्रकृति का रूप यह शरीर है – उससे जो ऊपर उठा अर्थात् शरीर में भी जिसकी आसक्ति नहीं रही – वही परम वैरागी है।

चौथा प्रश्न – जीव और ईश्वर में भेद –

दोहा – माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव ।
बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव ।।

अर्थात् जो माया को, ईश्वर को और स्वयं को नहीं जानता – वह जीव और जीव को उसके कर्मानुसार बंधन तथा मोक्ष देने वाला – ईश्वर।

पाँचवाँ प्रश्न – भक्ति के साधन कौन से हैं, जिससे भक्ति प्राप्त हो जाए ?

उत्तर – भगवान श्री राम कहते हैं –

भगति कि साधन कहउँ बखानी । सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी ।।
प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती । निज निज कर्म निरत श्रुति रीती ।।

एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा । तब मम धर्म उपज अनुरागा ।।
श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाही । मम लीला रति अति मन माहीं ।।

भक्ति के साधन बता रहा हूँ, जिससे प्राणी मुझे बड़ी सरलता से पा लेता है। सबसे पहले विप्रों के चरण विपरें। विप्र का अर्थ है, जिसका जीवन विवेक प्रदान हो, ऐसे विप्रों के चरण विपरें। वेदों के बताये मार्ग पर चलें, अपने कर्तव्य-कर्म का पालन करें। इससे विषयों में वैराग्य होगा तथा वैराग्य उत्पन्न होने पर भगवान के ( भागवत ) धर्म में प्रेम होगा। तब श्रवणादिक नौ प्रकार की भक्तियाँ आ जाएंगी और भगवान की लीलाओं में प्रेम हो जाएगा।

संतों के चरणों में प्रेम हो, मन, कर्म और वचन से भगवान का भजन करे तथा गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सबमें मुझे ही देखे, सबको वंदन करे, सबकी सेवा करे- इतना कर ले, तो समझो मिल गयी भक्ति !

अब भक्ति मिली है या नहीं, इसका हमें कैसे पता चले ????

तो इसके लिये दो चौपाई और बतायी हैं –

मम गुन गावत पुलक सरीरा।गदगद गिरा नयन बह नीरा ।।
काम आदि मद दंभ न जाकें । तात निरंतर बस मैं ताकें ।।

मेरे गुणों को गाते समय जिसका तन पुलकायमान हो उठे, शरीर पुलकित हो जाए, वाणी गदगद हो जाए और नेत्रों से पानी बहने लगे-

लेकिन केवल इतना ही काफी नहीं है। जिसका शरीर पुलकित हो उठे, वाणी गदगद हो जाए और नेत्रों से नीर बहने लगे, उसे best acting का award अवश्य मिलेगा, लेकिन भगवान का भक्त नहीं कहलायेगा। उसके लिए एक चौपाई और कही है, वो बड़े काम की है –

” काम आदि मद दंभ न जाकें “

जिसमें काम ( विकार ) न हो, मद ( अहंकार ) न हो और सबसे बड़ी बात दंभ ( पाखंड ) न हो – वही भक्त है। भगवान ऐसे भक्त के सदा वश में रहते हैं।

दोहा – बचन कर्म मन मोरि गति भजन करहिं नि:काम ।
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम ।।

भगवान कहते हैं – जिसको मन, कर्म और वचन से मेरा ही आश्रय है तथा जो निष्काम भाव से मेरा भजन करता है, उसके हृदय में मैं सदा विश्राम करता हूँ।

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